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मुद्रा 2015-16
  फसलों की खेती की विधियां
रबी फसल - मसूर

मसूर की कृषि कार्यमाला -

भूमि का चुनाव एवं तैयारी -  

मसूर सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है। किन्तु दोमट और भारी भूमि इसके लिये अधिक उपयुक्त है। भूमि का पी.एच. मान 6.5 से 7.0 के बीच होना चाहिये तथा जल निकास का अच्छा प्रबंध होना चाहिये। खाली खेतों में 3-4 जुताई कर खेती अच्छी तरह तैयार करें एवं खरीफ के खेत खाली होने के बाद 2-3 जुताई कर पाटा चलाये जिसे नमी सिंचित हो सके । खरपतवार होने पर उन्हे निकाल दें ।

 मसूर की उन्नत किस्में - 

किस्म 

पकने की अवधि

औसत पैदावार क्वि/एकड़

अन्य

जवाहर-1

110-115 दिन

10 - 14

इसका दाना मध्यम आकार का होता है।

जवाहर - 3

110-115 दिन

10 - 15

उकटा अवरोधी दाना बड़ा। दाना मध्यम आकार का होता है।

एल 4076

115-125 दिन

10 - 15

गेरूआ तथा उकटा अवरोधी , दाना मध्यम ।

के-75 मलिका

115-120 दिन

10 - 12

दाना छोटा होता है।

आई.पी.एल-81

110-115 दिन

10 - 12

दाना मध्यम आकार का होता है।

बीज एवं बीजोपचार -

 मसूर का बीज 16-18 किलो एकड़ एकड़ लगता है । बीज को प्रारंभिक अवस्था में फफूंद जनित रोगों से बचाने के लिये बुआई के पूर्व थाइरम / कार्बन्डाजिम 2:1 की 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलो बीज उपचारित करें। इसके बाद राइजोबियम तथा पी.एस.बी. कल्चर प्रत्येक की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज उपचारित करें ।

बुआई का समय एवं तरीका -

अक्टूबर के मध्य बुआई के लिए उपयुक्त समय है । बुआई में देरी होना उपज में कमी लाती है । 15 नवम्बर तक का समय मसूर फसल की बुआई देरी की अवस्था में की जा सकती है । मसूर की कतार से कतार की दूरी 25-30 से.मी. एवं 5-7 से.मी.गहरा बोना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक -

गोबर का खाद या कम्पोस्ट 2-2.5 टन प्रति एकड़ डाले। मसूर की फसल ज्यादातर असिंचित क्षेत्रों में ली जाती है। जिसमें 6-8 नत्रजन 16-20 कि.स्फुर 6-8 कि.गंधक प्रति एकड़ देते है । असिंचित अवस्था में 6-8 किलो नत्रजन और 12-16 किलोग्राम फास्फोरस तथा सिंचित क्षेत्र में 8-10 किलो नत्रजन और 20 किलो फास्फोरस प्रति एकड़ के हिसाब से देना चाहिए । अच्छी पैदावार के लिए 6-8 किलो गंधक देना उपयुक्त है। भूमि मे पोटाष की कमी हो तो 8-10 कि.ग्रा. पोटाष प्रति एकड़ देना चाहिये।

सिंचाई -

सामान्यत: मसूर असिंचित क्षेत्रों में ली जाती है । परन्तु सिंचाई उपलब्ध होने पर पलेवा देकर बुवाई करना चाहिये। इससे अंकुरण अच्छा होता है। सामान्यत: बाद मं सिंचाई की आवष्यकता नही होती है। सिंचाई उपलब्ध होने पर फूल आने के पूर्व हल्की सिंचाई करना चाहिये। इससे भरपूर पैदावार ली जा सकती है।

खरपतवार प्रबंधन -

मसूर की फसल में 50 दिनों तक खरपतवारों को नियंत्रित रखना चाहिये। खेत में नींदा उगने पर हेन्ड हा या डोरा चलाना चाहिये, इससे खरपतवार नियंत्रण होगा तथा वायुसंचार के लिये गुड़ाई भी हो जाती है। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिये बुवाई पूर्व फ्लूक्लोरोलिन 300 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ 250 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।

पौध संरक्षण-

अ. कीट-

मसूर में माहो, थ्रिप्स तथा फली छेदक इल्ली कीटों का प्रकोप होता है। माहो एवं थ्रिप्स के नियंत्रण के लिये मोनोक्रोप्टोफास एक मि.ली. मेटासिस्टाक्स 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। फल छेदक इल्ली के लिये इन्डोसल्फास व 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्यूनालफास एक मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोलकर छिड़काव करने से कीट नियंत्रित हो जाते हैं। खेत में छिड़काव एक समान होना चाहिये।

बीमारियां - 

मसूर में मुख्य रुप से उक्टा तथा गेरुआ रोगों का प्रकोप रहता है। उक्टा रोग की उग्रता को कम करने के लिये थायरम 3 ग्राम या 1.5 ग्राम थायरम / 1.5 ग्राम कार्बान्डाइजम का मिश्रण प्रति किलों बीज को उपचारित करके बोयें। उक्टा निरोधक जाति जैसे जे.एल.-3 आदि बोयें। कभी-कभी गेरुआ रोग का भी प्रकोप होता है। इसके नियंत्रण के लिये डायथेन एम 45, 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिये। गेरुआ प्रभावित क्षेत्रों में एल. 4076 आदि गेरुआ निरोधक जातियां बोयें।

कटाई गहाई एवं भंडारण -

फसल को पूर्ण रूप से पक जाने पर उसकी कटाई करें एवं कटाई पश्चात गहाई कर बीजो को सुखाकर बोरों या बण्डों में 0.05 मेलोथियॉन का घोल छिड़ककर सूखने पर भण्डारण करें ।


M.P. Krishi
 
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