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मुद्रा 2015-16
फसल सिफारिशें

 ख़रीफ फसल - सोयाबीन

  रोग प्रबंधन - सोयाबीन


रोग

बेकटीरियल पस्च्यूल  

हिन्दी नाम
 

जीवाणु स्फोट

कारक जीवाणु

जेन्थोमोनस एक्ज़ोनोपोडिस

लक्षण एवं क्षति

  • दायें हाथ के तरफ जीवाणु स्फोट का फोटो हैं।

  • पत्ती के बीच में एक या दोनों तरफ छोटे हरे धुधंले धब्बे देखे जा सकते हैं।

  • बाद में छोटा, उठा हुआ एवं हल्के रंग का धब्बा बीच में दिखाई देता हैं।

नियंत्रण

  • 2 ग्राम तामयुक्त फंफूदनाशक व 50-100 मि.ग्रा. प्रति लीटर स्टज्पटोसाईक्लीन पानी के साथ छिड़काव करें। (एक हेक्टेयर में लगभग 750-1000 लीटर पानी का उपयोग करे

  • 2 ग्राम तामयुक्त फंफूदनाशक व 50-100 मि.ग्रा. प्रति लीटर स्टज्ेपटोसाईक्लीन पानी के साथ छिड़काव करें। (एक हेक्टेयर में लगभग 750-1000 लीटर पानी का उपयोग करें।

आई.पी. एम.
 

  • कीट तथा रोग निरोधक जातियां बोयें।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड़ इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतु रसायनिक नियंत्रण खंड देखे।


रोग

राईज़ोटोनिया एरियल ब्लाइट

 

हिन्दी नाम
 

राईज़ोटोनिया शीश झुलसन

कारक जीवाणु

राईज़ोटोनिया सोलानाई

लक्षण एवं क्षति

  • दायें हाथ के तरफ राईज़ोटोनिया शीर्ष झुलसन का फोटो हैं।

  • प्रभावित पत्तियां में धब्बे पनीले से दिखाई देते है।

  • शीघ ही पत्तियां हरे भूरे से लाल भूरे रंग की दिखने लगती है।

  • बाद में रोग ग्रसित अंश गहरा भूरा या काला हो जाता है।

नियंत्रण

  • बीज उपचार अगर किया जाए तो रोग को रोका जा सकता है।

  • रोग के शुरूआती लक्षण नजर आते ही पत्ती फंफूदनाशक का उपयोग करें।

  • 3 ग्राम तामयुक्त फंफूदनाशक या मेनकोजेब 3 ग्रा. प्रति लीटर का छिड़काव करें।

आई.पी. एम.
 

  • कीट तथा रोग निरोधक जातियां बोयें।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड़ इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतु रसायनिक नियंत्रण खंड देखे।


रोग

सोयाबीन का रस्ट 

 

हिन्दी नाम
 

सोयाबीन का गेरुआ रोग

कारक जीवाणु

फेकेस्पोरा फैकोराइज़ी

लक्षण एवं क्षति

  • दायें हाथ के तरफ सोयाबीन के गेरुआ रोग का फोटो हैं।

  • रोग की शुरुआत में पत्तों पर छोटे पनीले धब्बे दिखते है जो आकार मे धीरे-धीरे बढते है व उनका रंग स्लेटी से भुरा या कत्था हो जाता है।

  • भूरे गहरे से भूरे लालिमा लिए हुए धब्बे दिखाई देते है साथ ही फंफूद का
    यूरिडिया भी दिखाई देता है।

  • ज्यादा प्रभावित पत्तियों के अंश नष्ट हो जाते है।

  • गंभीर अवस्था में पौधा लाल हो जाताहै। गेरु जैसी धूल झड़ती है।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतु रसायनिक नियंत्रण खंड देखे।

नियंत्रण

  • 3 ग्राम / लीटर मेनकोज़ेब का छिड़काव किया जा सकता है। या रोग नियंत्रण के लिए टाईडीमीफोन का छिड़काव किया जा सकता है।

  • संक्रमित क्षेत्रों में बीमारी आने के पहले छिड़काव कर देना चाहिए।

  • रोग नियंत्रण के लिए प्रोपोकोनीजॉल का छिड़काव किया जा सकता है।

आई.पी. एम.
 

  • प्रतिरोधक जातियां जैसे अंकुर, जे.एस. 80-21, पी.के.1024, पी.के.1029 बोये।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतू रसायनिक नियंत्रण खंड देखे।


 

रोग

सोयाबीन मोज़ाइक वाइरस

हिन्दी नाम
 

सोयाबीन का फैला विषाणु रोग

कारक जीवाणु

सोजा वायरस

लक्षण एवं क्षति

  • दायें हाथ के तरफ सोयाबीन का फैला विषाणु रोग का फोटो हैं।

  • सोयाबीन का फैला विषाणु रोग बीज से हो सकता है।

  • संक्रमक बीज या तो अंकुरित नही होते या रोगयुक्त पौधे उत्पन्न करते है।

  • रोगयुक्त पौधों की पत्तियां सुकड़ी और नीचे की ओर मुडी हुई होती है।

नियंत्रण

  • चूंकि यह वायरस कीड़ों से फैलता हैइसलिए कीड़ों की रोकधाम के लिए मेटासिसटाक्स 10 मि.लि. 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़के। या

  • 30 ई.सी. डाईमिथिएट 750-1000 मि.ली. प्रति हेक्टेयर । या.

  • 25 ई.सी. क्वीनोलफॉस 1000 मि.ली. प्रति हेक्टेयर 600 से 800 लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।

  • शुरुवात में ही रोगी पौधों को निकाल कर नष्ट कर दें।

आई.पी. एम.
 

     प्रतिरोधक किस्में जैसे अंकुर, पी.के.327, पी.के. 416, पी.के. 564 का उपयोग करें।

  • बीज रोग मुक्त होने चाहिए और संक्रमक पौधों को हटा देना चाहिए।

  • फसल चक्र में सोयाबीन के बाद या पहले उन फसलों को उगाना चाहिए जो इस रोग से प्रभावित न हो एवं अत्यधिक संक्रामित क्षेत्रों में सोयाबीन की फसल कुछ सालों के लिए न ले।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  •  कटाई के बाद फसल के अवशेषों का पूरी तरह नष्ट करें। खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड़ इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतू रसायनिक नियंत्रण खंड देखे।


रोग

ारकोल रॉट  

हिन्दी नाम
 

चारकोल सड़न

कारक जीवाणु

मेक्रोफोमिना फेसीलिना

लक्षण एवं क्षति

  • दायें तरफ सोयाबीन का चारकोल सड़न रोग का फोटो हैं।

  • यह पौधौ की जडें और उसके निचले भाग का प्रमुख रोग है।

  • फंफूद काले बारीक थक्के की तरह दिखता है इसलिए इसे चारकोल सड़न कहते है।

  • यह रोग नमी की कमी से, निमाटोड के आक्रमण से, मिट्टी के कड़े होने से या पोषक तत्वों की कमी से हो सकता है।

  • रोग ग्रसित पौधों के तन्तू स्लेटी रंग के हो जाते है।

  • यदि आक्रमण जारी रहता है तो तने का निचला हिस्सा छल्लेदार होकर सूख जाता है।

  • यदि संक्रमण रहता है तो तन्तू खत्म हो जाते है और पौधा मर जाता है।
    जड़ों और पौधे के निचले भाग पर स्कोलेरेशिया बन जाते है।

नियंत्रण

  • फसल के अनुसार सन्तुलित उर्वरकों का उपयोग करें।

  • सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को भी पूरा करना चाहिए, जिससे पौधा किसी दबाव में न रहे।

आई.पी. एम.
 

  • सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करना चाहिए जिससे पौधा किसी दबाव में न रहे।

  • प्रतिरोधक जातियां ही बोयें।

  • बीज रोग मुक्त होने चाहिए और संक्रमक पौधों को हटाना चाहिए।

  • फसल चक्र में सोयाबीन के बाद या पहले उन फसलों को उगाना चाहिए जो इस रोग से प्रभावित न हो।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड़ इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतू रसायनिक नियंत्रण खंड देखे।


रोग

फाइटोथोरा जड़ और तना सड़न
 

 

हिन्दी नाम
 

फाइटोथोरा जड़ और तना सड़न

कारक जीवाणु

फाइटोथोरा मेगार्स्पमा

लक्षण एवं क्षति

  • दायें तरफ सोयाबीन का फाइटोथोरा जड़ और तना सड़न रोग का फोटो हैं।

  • यह मिट्टी से होने वाला सबसे अधिक संक्रामक रोग है।

  • यदि मिट्टी में जल निकासी ठीक न हो तो इस रोग की संभावना बढ़ जाती है।

नियंत्रण

 
  • 1 प्रतिशत मेटालेसिल का उपयोग करें।

  • छिड़काव के दारा ही उपयोग करें।

आई.पी. एम.
 

  • सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को भी पूरा करना चाहिए जिससे पौधा किसी दबाव में न रहे।

  • प्रतिरोधक जातियां ही बोयें।

  • बीज रोग मुक्त होने चाहिए और संक्रमक पौधों को हटाना चाहिए।

  • फसल चक्र में सोयाबीन के बाद या पहले उन फसलों को उगाना चाहिए जो इस रोग से प्रभावित न हो।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड़ इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतू रसायनिक नियंत्रण खंड़ देखे।


रोग

माइरोथीशीयम लीफ स्पॉट

 

हिन्दी नाम
 

माइरोथीशीयम पर्ण दाग

कारक जीवाणु

माइरोथीशीयम रोरीडम
 

लक्षण एवं क्षति

  • दायें हाथ के तरफ सोयाबीन का माइरोथीशीयम रोरीडम रोग का फोटो हैं।

  •  ग्रसित पत्तियों पर अनियमित हल्के भूरे धब्बे हो जाते है।

  • फिर पत्तियों पर गोल छेद हो जाते है।

नियंत्रण

नियंत्रण के लिए 3 ग्राम / लीटर मेनकोज़ेब का छिड़काव किया जा सकता है।

आई.पी. एम.
 

  • प्रतिरोधक किस्में जैसे बाग, जे.एस. 71-05 का उपयोग करें।

  • बीज रोग मुक्त होने चाहिए और संक्रमक पौधों को हटाना चाहिए।

  • फसल चक्र में सोयाबीन के बाद या पहले उन फसलों को उगाना चाहिए जो इस रोग से प्रभावित न हो।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड़ इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतू रसायनिक नियंत्रण खंड देखे।


रोग

श्याम वर्ण एन्थ्रेकनोज  

हिन्दी नाम
 

एन्थ्रेकनोज

कारक जीवाणु

कोलिकटोट्राईकम ट्रंककेटम
 

लक्षण एवं क्षति

  • दायें तरफ सोयाबीन के एन्थेकनोज का फोटो हैं।

  • पत्ती, फल्ली, तने पर लाल भूरे धब्बे दिखाई पड़ते है।

नियंत्रण

3 ग्राम / लीटर मेनकोज़ेब का छिड़काव किया जा सकता है।

आई.पी. एम.
 

  • प्रतिरोधक जातियां ही बोयें।

  • बीज रोग मुक्त होने चाहिए और संक्रमक पौधों को हटाना चाहिए।

  • फसल चक्र में सोयाबीन के बाद या पहले उन फसलों को उगाना चाहिए जा इस रोग से प्रभावित न हो।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों का पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां  हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतू रसायनिक नियंत्रण खंड़ देखे।


रोग

फांग आई लीफ स्पॉट
 

हिन्दी नाम
 

पत्ती धब्बा

कारक जीवाणु

सरकोस्फोरा सोज़े

लक्षण एवं क्षति

दायें तरफ सोयाबीन का पत्ती धब्बा रोग का फोटो हैं।

नियंत्रण

3 ग्राम/ लीटर मेनकोज़ेब का छिड़काव किया जा सकता है।

आई.पी. एम.
 

  • प्रतिरोधक जातियां ही बोयें।

  • बीज रोग मुक्त होने चाहिए और संक्रमक पौधों को हटाना चाहिए।

  • फसल चक्र में सोयाबीन के बाद या पहले उन फसलों को उगाना चाहिए जो इस रोग से प्रभावित न हो।

  • रोग कारक जीवाणु से मुक्त बीजों का ही उपयोग करें।

  • कटाई के बाद फसल के अवशेषों को पूरी तरह नष्ट करें।

  • खेत में अगर गीली पत्तियां हो तो कोई भी सस्य क्रिया नहीं करनी चाहिए।

  • खेत में पड़े हुए ठुठे एंव रोग युक्त जड़ इत्यादि नष्ट कर देना चाहिए।

  • रसायनिक नियंत्रण हेतू रसायनिक नियंत्रण खंड़ देखे।


रोग

नो पॉडिंग  / पारशियल फिंलिग ऑफ पॉडस बड प्रोलिफ्रेशन
रोग
 

 

हिन्दी नाम
 

अफलन
 

कारक जीवाणु

एम.एल.ओ., रेबडिटिस, प्रेटीलेन्चस हेट्रोडेरा, हेकीकॉटीलेनचस और टाईलेनचस
 

लक्षण एवं क्षति

  • बड प्रोलीफेरेशन हो जाता है।

  • फूल नहीं बनते है।या तो फल्लियां नही बनती या बेआकार
    बनती है।

  • बीज फल्ली में ही अंकुरित हो जाते है।

नियंत्रण

  • निम्नलिखित कोई भी कीटनाशक का फूल आने पर पहला छिड़काव करें और 15 दिन बार पुन:छिड़काव करें।

  • 20 ई.सी. ट्राईज़ोफॉस 0.8 लीटर प्रति हेक्टेयर या 20 ई.सी. क्लोपाइरीफॉस 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर या मीथोमिल 2 लीटर प्रति हेक्टेयर या 50 ई.सी. इथीयॉन 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर या 25 ई.सी. क्वीनोलफॉस 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर ।

आई.पी. एम.
 

  • गर्मी में गहरी जुताई।

  • प्रमाणित बीजों का उपयोग करें।

  • कृषि जलवायु क्षेत्र के अनुसार फसल चद्बक्र अपनाए।

  • अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का उपयोग करें।

  • फसल चक्र अपनायें।


M.P. Krishi
 
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