फसलों की खेती की विधियां
खरीफ फसल - सूरजमुखी
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सूरजमुखी की
कृषि कार्यमाला |
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भूमि का चुनाव एवं तैयारी
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खरीफ के मौसम में सूर्यमुखी की काष्त के लिये
हल्की से मध्यम मिट्टी जिसमें पानी के निथार की अच्छी व्यवस्था हो
उपयुक्त है। दोमट एवं भारी जमीन में यह फसल रबी या चैत के मौसम में
अर्ध सिंचित से सिंचित क्षेत्रों में ली जा सकती है, इन क्षेत्रों
में यह गेंहू, जौ, जई आदि की फसलों में साथ ली जा सकती है। एक या
दो बार गहरी जुताई कर बखर चलायें तथा नींदा नष्ट कर मिट्टी को
भुरभुरा बना लें। |
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बीज का चुनाव
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सूर्यमुखी में दो प्रकार का बीज बाजार में
उपलब्ध है।
1- साधारण किस्में, 2.संकर बीज - संकर किस्मों
के लिये प्रतिवर्ष नया बीज प्राप्त कर फसल उगाना होता है, परंतु
साधारण किस्मों के लिये बीज को प्रतिवर्ष बदलने की आवश्यकता नहीं
है। एक बार बीज खरीद कर उसे तीन वर्ष तक बोकर उपयोग किया जा सकता
है। साधारण तथा संकर किस्मों का चयन प्रदेश के विभिन्न कृषि अंचलों
की जलवायु को देखते हुये करना चाहिये। रबी फसल के लिये यह मध्यम से
भारी जमीन में 100-110 दिन में पकने वाली किस्में जैसे सूर्या, को
2 एवं संकर किस्मों में के.बी.एस.एच.-1, ज्वालामुखी,
एम.एस.एफ.एच-8, का चयन करना उपयुक्त होगा। प्रदेश की जलवायु में
110 दिन से अधिक वाली किस्में उपयुक्त नहीं है।
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किस्म |
स्थान अनुकूलता |
पकने की अवधि (दिन) |
उपज
(क्विं प्रति एकड़) |
तेल (प्रतिशत) |
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मार्डन
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सम्पूर्ण म.प्र. |
80-90 |
2.8-3.20 |
40-45 |
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सूर्या |
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90-100 |
3.20-4 |
40-45 |
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सी.ओ. -2
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सतपुड़ा का पठार
निमाड-मालवा का पठार |
90-95 |
3.20-4 |
40-45 |
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हाईब्रिड |
सम्पूर्ण म.प्र. |
90-95 |
6.00-6.40 |
42-45 |
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के.बी.एस.एच-1 |
सतपुड़ा का पठार निमाड मालवा का पठार |
90-95 |
4.80-6.00 |
40-42 |
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एम.एस.एफ.एच-1 |
सतपुड़ा का पठार निमाड मालवा का पठार |
90-95 |
4.8-6.00 |
40-42 |
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एम.एस.एफ.एच. -8 |
- |
90-95 |
4.80-6.00 |
40-42 |
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एम.एस.एफ.एच. -17 |
सम्पूर्ण म.प्र. |
90-95 |
4.80-6.00 |
40-42 |
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ज्वालामुखी |
सम्पूर्ण म.प्र. |
84-90 |
7.20-8.00 |
40-44 |
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बोनी का समय |
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कम वर्षा वाले क्षेत्रों में खरीफ मौसम में
सूरजमुखी की फसल के लिये उपयुक्त समय जुलाई के द्वितीय पखवाड़े से
अगस्त का पहला पखवाड़ा है। बोनी के समय का निर्धारण वर्षा, अवधि,
भूमि तथा सहयोग फसल पर निर्भर करता है। मुख्य फसल के रुप में इसकी
बोनी के लिये वर्षा के अनुसार जुलाई मध्य के अगस्त के मध्य तक का
समय उपयुक्त है। यह फसल के रुप में इसे मूंगफली, कपास तथा ज्वार के
साथ इन फसलों के साथ ही बोया जाना चाहिये।
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में रामतिल के बदले सूर्यमुखी की बोनी
मध्य अगस्त में की जा सकती है। अधिक वर्षा से नष्ट हुये ज्वार,
मूँग, उड़द एवं अन्य खरीफ के फसलों के स्थान पर इसे बोया जा सकता
है। खरीफ सूर्यमुखी की बोनी की योजना इस तरह से करें कि पुष्पावस्था
के समय वर्षा न हो एवं मौसम खुला रहे। पुष्पावस्था में वर्षा होने
पर उत्पादकता में कमीं आती है। रबी मौसम के लिये अक्टूबर के
प्रारम्भ से नवम्बर तक का समय उपयुक्त है, जायद फसल के लिये जनवरी
के अंतिम सप्ताह से फरवरी के मध्य तक का समय उपयुक्त है।
बीज की मात्रा : उन्नत किस्मों के लिये प्रति एकड़ बीज की मात्रा 4
किलो एवं संकर किस्मों के लिये 3-3.5 किलो है। |
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बीजोपचार :
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बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिये 3 ग्राम थायरम
एवं 1 ग्राम बेवीस्टीन के मिश्रण को 1 किलो बीज की दर अथवा 3 ग्राम
प्रति किलो बीज एवं डाउनी मिल्डयू के लिये रिडोमिल 6 ग्राम प्रति
किलो बीज के साथ उपचारित करें।
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बुवाई की विधि:
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खरीफ के मौसम में जिस खेत में पानी के निकास
की अच्छी व्यवस्था है वहां बोनी कतारों में सीडड्रील की सहायता से
अथवा दुफन या तिफन में सरता लगा कर कतारों में करें। खरीफ की फसल
के लिये कतार से कतार की दूरी 45 से.मी. एवं संकर किस्मों के लिये
कतार से कतार की दूरी 60 से.मी. रखें। पौधे से पौधे की दूरी 30
से.मी. रखें एवं प्रति बिंदु 2-3 बीज बोयें। बोनी 4-5 से.मी. गहराई
तक ही करें अधिक गहराई पर बोनी करने से अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव
पड़ता है। |
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उर्वरकों की मात्रा
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सूर्यमुखी के विपुल उत्पादन के लिये कम्पोस्ट#गोबर
की पकी हुई खाद 3-4 टन प्रति एकड़ की दर से बोनी के पूर्व खेतों में
डालें। रासायनिक खाद के प्रयोग के पूर्व मिट्टी परीक्षणोपरांत
आवश्यकतानुसार बोनी के समय 12-16 किलो नत्रजन, 24 किलो स्फुर (सुपर
फास्फेट के रुप में) एवं 12 किलो पोटाश की मात्रा खेत में डालें।
स्फुर के रुप में सुपर फास्फेट का उपयोग करने से फसल में गंधक की
पूर्ति भी होती है। नत्रजन की शेष मात्रा 8-12 किलो प्रति एकड़ की
दर से बोनी के 30-45 दिन बाद स्टार अवस्था के पूर्व डालें।
विरलन निंदाई एवं गुड़ाई : बोनी के 3-4 सप्ताह बाद प्रति बिंदु एक
पौधा छोड़ कर पौधे से पौधे की दूरी 30 से.मी. रखते हुये अतिरिक्त
पौधों को उखाड़ दें। जिन बिंदुओं पर अंकुरण नहीं हुआ है उन बिंदुओ
पर पुन: बोनी करें। प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या सुनिश्चित करें।
खरीफ के मौसम में नींदा की समस्या अधिक होने पर बोनी के बाद अंकुरण
के पूर्व एलाक्लोर (लासो) 600 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ की दर
से 250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने पर नींदा नष्ट हो जाते
हैं। तत्पश्चात् डोरा, कुल्पा अथवा हस्त चलित हो, द्वारा निंदाई
करना चाहिये। आवश्यक होने पर 20-24 दिन बाद दूसरी निंदाई रासायनिक
खाद डालने के पूर्व करना चाहिये। |
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सिंचाई
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4-6 एवं जायद में 6-7 बार सिंचाई करना चाहिये।
स्टार अवस्था, फूल खिलते समय एवं बीज भरने की अवस्था में आवश्यक हो
तो सिंचाई करना चाहिये, ताकि उत्पादन में कमी न हो। |
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पौध संरक्षण :
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कीट
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कीट : सूर्यमुखी के फसल को कटुआ इल्ली, सफेद
मक्खी, एफिड, जेसिड, तम्बाकू कीट, बिहार बाल इल्ली एवं चने की इल्ली,
फसल की विभिन्न अवस्थाओं से क्षति पहुँचाती है। कटुआ इल्ली की
रोकथाम के लिये थिमेट या फोरेट को रेत में मिलाकर मिट्टी में डालने
से रोकथाम होती है। सामान्य प्रकोप की अवस्था में इल्लियों को
मिट्टी से खोद कर नष्ट करना लाभप्रद है। मोनोक्रोटोफास 0.05
प्रतिशत या इण्डोसल्फान 0.07 प्रतिशत या फास्फोमिडान 0.03 प्रतिशत
200-250 लीटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना
चाहिये। दवा का छिड़काव सुबह या शाम हवा की दिशा में करना चाहिये।
पुष्पावस्था में अति आवश्यक होने पर ही कीटनाशक दवा का उपयोग करें,
अन्यथा कीटनाशक दवा के उपयोग, परागण करने वाले लाभकारी कीटों को
क्षति पहुॅचाती है एवं उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कीट
नियंत्रण के लिये प्रपंच का उपयोग भी कर सकते हैं। |
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बीमारियाँ |
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बीमारियाँ : पत्ती में आने वाली गेरुआ, पत्ती
झुलसन, जड़ तथा तना सड़न की रोकथाम हेतु बीजोपचार एवं गर्मी में खेत
की गहरी जुताई कर पौध अवशेषों को एकत्र कर जलाना तथा रोगी पौधे के
चारों तरफ थायरम 1 प्रतिशत तथा कार्बेडिजम 1 ग्राम, प्रति लीटर पानी,
1 वर्ग मीटर भूमि हेतु 7 लीटर दवा के घोल के प्रयोग से अच्छे
परिणाम मिलते हैं। साथ ही खेत में पानी के निकासी की अच्छी व्यवस्था
करें। पत्ती रोग से रोकथाम के लिये डायथेन एम.-45, 25 ग्राम प्रति
10 लीटर पानी से उपचार करें। फूल सड़न की रोकथाम के लिये
इण्डोसल्फान 0.07 प्रतिशत के साथ डायथेन एम - 45, 0.02 प्रतिशत की
दर से उपचार करने पर लाभ होता है।
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कटाई, गहाई भण्डारण एवं पैदावार
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फसल के पौधे पककर पीले रंग में बदलने लगते हैं। तब
फसल की कटाई कर सुखा लेना चाहिये। सूखे फूलों को लकड़ी से पीट या दो फूलों
को आपस में रगड़ कर गहाई की जा सकती है। उड़ावनी विधि (सूपों से फटक कर)
से बीज को साफ कर धूप में सुखाा लें। सूर्यमुखी की अच्छी फसल 4-5
क्विंटल प्रति एकड़ या उससे भी अधिक की उपज ली जा सकती है। |
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विशेष
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मधुमक्खियों से सूर्यमुखी के परागण में अनुकूल
प्रभाव होता है एवं उपज में वृध्दि होती है। इसलिये सूर्यमुखी के
साथ-साथ मधुमक्खी पालन करने पर शहद का वाणिज्यिक उत्पादन किया जा सकता
है। साथ ही फसल की उत्पादकता भी बढ़ती है। तोतों के द्वारा पुष्पावस्था
के बाद सूर्यमुखी की फसल को अत्यधिक क्षति पहुँचती है। इसलिये कृषक बंधु
मिलकर अधिक से अधिक क्षेत्र मेें सूर्यमुखी लगावें, ताकि पक्षियों से
होने वाली क्षति को कम किया जा सके। |
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सूरजमुखी के उत्पादन में ध्यान देने योग्य बातें
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विपुल उत्पादन किस्मों/संकर बीज प्रमाणित
बीज क्रय करें।
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बोनी के पहले सूरजमुखी के बीज को 12 घंटे
भिगोकर छाया में सुखाकर बोने से अंकुरण तथा पैदावार 10-24
प्रतिशत बढ़ोतरी होती है। (सीड प्रायमिंग)
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बोनी की योजना ऐसी करें कि सूरजमुखी
फूलती-फलती फसल पर पानी बादल का प्रभाव न पड़ पाये।
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सूरजमुखी की फूलता फसल पर कीट एवं रोग
नाशक दवा का भुरकाव एवं छिड़काव को टालना चाहिये। अनिवार्य हो
तो दवा का भुरकाव/छिड़काव शाम के समय ही करें। सूरजमुखी का
परागण मधुमक्खियों से होता है, अत: इनकी संख्या में कमी न करें।
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हस्तपरागण सुबह 8-10 बजे एक दिन के अंतर
से करना चाहिये ऐसा करने से माथे में बीज अच्छा भरता है, उपज
में वृध्दि होती है।
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सूर्यमुखी के साथ ही मधुमक्खी पालन
कर शहद का उत्पादन करें एवं सूर्यमुखी की उत्पादकता भी बढ़ावें।
इससे शहद की अतिरिक्त आमदनी होगी।
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