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मुद्रा २०१२ - १३
फसलों की खेती की विधियां
रबी फसल - गेंहू
 

गेंहू की कृषि कार्यमाला (संक्षिप्त)

भूमि का चुनाव एवं तैयारी - 

गेंहू की खेती उचित जल प्रबंध के साथ सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। विपुल उत्पादन के लिये गहरी एवं मध्यम दोमट भूमि सर्वाधिक उपयुक्त है।

असिंचित क्षेत्र  

वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में छोटे-छोटे कन्टूर बना कर भूमि के कटाव और प्रत्येक जल को रोका जाना चाहिये। गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें। नमी संरक्षण हेतु प्रत्येक वर्षा के बाद बतर आने पर समय-समय पर खेत की जुताई करते रहें तथा वर्षा समाप्त होने पर प्रत्येक जुताई के बाद अवष्य लगायें।

सिंचित क्षेत्र  

खरीफ फसल काटने के तुरंत बाद ही जमीन की परिस्थिति के अनुसा जुताई करें। यदि खेत कड़ा हो और जुताई सम्भव न हो तब सिंचाई देकर जुताई करें। दो या तीन बार बखर या हल चलाकर जमीन भुरभुरी करें, अंत में पाटा चलाकर भूमि समतल बनायें।

बुवाई का समय

बुवाई का समय - सिंचाई की व्यवस्था के आधार पर निम्नानुसार बोनी करे-

  1. असिंचित गेंहू-15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक, 2. अर्धसिंचित गेंहू 15 अक्टूबर से 10 नवंबर तक, 3. सिंचित गेंहू (समय से) 10 नवंबर से 25 नवम्बर तक, 4. सिंचित गेंहू (देरी से) 05 दिसम्बर से 20 दिसम्बर तक।

बीज की मात्रा   

सिंचित एवं असिंचित किस्मों के लिये 40 किलो, असिंचित देर से बोई जाने वाली किस्मों के लिये 48 किलो प्रति एकड़ बीज दर रखी जाती है।बीज की मात्रा का निर्धारण दानों के वजन एवं अंकुरण क्षमता पर निर्भर करता है। सामान्यत: 38 ग्राम प्रति एक हजार बीज के वजन वाली किस्मों का बीज 40 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बोयें। देरी से बोनी की स्थिति में बीज दर में 20-25 प्रतिशत बढ़ोतरी करके बोनी करें। अंकुरण कम होने की दशा में बीज दर आवष्यकता अनुसार निर्धारण कर बोनी करें। 

बीजोपचार 

दीमक के नियंत्रण हेतु बीज को कीटनाशक दवा क्लोरोपाइरीफास 20 ई.सी. 400 मि.ली. 5 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति क्विंटल बीज के हिसाब से बीजोपचार करें। इसके पष्चात् कार्बोक्सिन (विटावेक्स 75 डब्ल्यू.पी.) या बेनोमिल (बेनलेट 50 डब्ल्यू.पी.) 1.5-2.5 या थाइरम 2.5 - 3 ग्राम दवा ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुवाई पूर्व बीज को एजेटोबेक्टर 5-10ग्राम एवं पी.एस.बी. कल्चर 10-20 ग्राम प्रति किलो ग्राम के हिसाब से उपचारित करें। 

बुवाई का तरीका  

असिंचित अवस्था में कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. अर्धसिंचित अवस्था में कतार की दूरी 23-25 से.मी. तथा सिंचित अवस्था में कतार से कतार की दूरी 20 -23 से.मी. रखें। पिछेती बोनी की अवस्था में कतार से कतार की दूरी 15-18 से.मी. रखना चाहिये। बीज की बुवाई 3 -4 से.मी. गहराई पर करें। शुष्क बुवाई की स्थिति में उथली बोनी अंकुरण के लिये लाभप्रद होती है। 

उन्नत किस्में -- 

क्र 

कृषि पारिस्थितिकी पिसी किस्में कठिया किस्में अवधि दिनों मेंÆ  उपज क्विं प्रति एकड़
1 असिंचित/अर्धसिंचित  जे.डब्ल्यू.एस. - 17,सुजाता एच.डब्ल्यू. 2004, एच.आई. 1500, एम.पी. 3020, सी 306

एच.डी. 4672 अमर, एच.आई. 8627 

135-140 6-8
2 सिंचित समय पर बोनी हेतु

एम.पी. 1142, एच.आई. 1077, जी.डब्ल्यू 273, जी.डब्ल्यू 322, जी.डब्ल्यू 190

राज 1555, एच.डी. 4530, एच.आई. 8498, एच.आई 8381, जे.डब्ल्यू 1106 सुधा 

115-125 16-20
सिंचित देरी से बोनी हेतु

डी.एल. 788-2, लोक-1, जी.डब्ल्यू 173, एम.पी. 4010, एच.डी. 2864

- 95-110 15-16

खाद उर्वरक की मात्रा  

  अ. असिंचिम अवस्था 

आधार खाद के रुप में 16 किलो ग्राम नत्रजन, 8 किलोग्राम स्फुर प्रति एकड़ बुवाई के समय दुफन या नारी के अगले पोर से देना चाहिये। मिट्टी परीक्षण में यदि पोटाश की मात्रा कम पाई जाती है तो 4 किलो ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से बुवाई के समय देना चाहिये। खाद को बीज से 2-3 से.मी. नीचे डालना चाहिये। 

  ब. अर्धसिंचित अवस्था

नत्रजन 24 किलोग्राम, स्फुर 16 किलोग्राम तथा 8 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ देना चाहिये। स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी बोनी के समय आधार रुप में, शेष आधी 12 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ प्रथम सिंचाई पर दें।

  स. सिंचित अवस्था  

सिंचित अवस्था - सिंचित अवस्था मेें नत्रजन 40-48 किलोग्राम, स्फुर 24 किलो ग्राम तथा पोटाश 12 किलोग्राम प्रति एकड़ देना चाहिये। बोनी के समय नत्रजन आधार रुप में 1/2 तथा पूरी मात्रा में स्फुर व पोटाश देना चाहिये। शेष 1/2 नत्रजन में से 1/4 प्रथम सिंचाई 20-21 पर तथा 1/4 दूसरी सिंचाई 40-45 दिनों पर देना चाहिये। जिन खेतों में मिट्टी परीक्षण जस्ते की कमी पाई जाती है वहां 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ बुवाई के पहले खेत में आधार खाद के रुप में देना चाहिये। यदि खेतों में सतत् गेंहू की खेती की जा रही है तो 2 वर्ष में एक बार 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से जिंक सल्फेट डालना चाहिये।

सिंचाई प्रबंधन
सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर गेंहू की विभिन्न अवस्थाओं पर निम्न तालिका के अनुसार सिंचाई करें-

सिंचाई शीर्ष जड़ अवस्था

कल्ले बनने की अवस्था 

गभोट की अवस्था

फूल बनने की अवस्था

दूध अवस्था दाने भरने की अवस्था

18-21 दिन 40-42 दिन 55-60 दिन 65-70दिन 80-85 दिन 100-105 दिन
एकसिंचाई x x x x x
दो सिंचाई

x x x x
तीन सिंचाई

x x x
चार सिंचाई

x x
पांच सिंचाई

x
छ: सिंचाई

खरपतवार प्रबंधन  

अ. चौड़ी पत्ति वाले खरपतवार

इनके नियंत्रण के लिये 2-4, डी- सोडियम साल्ट 200 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ की दर 200 लीटर पानी में घोल बनाकर 25-30 दिन बाद छिड़काव करें। दवा का 40 दिन बाद छिड़काव फसल के लिये हानिप्रद होता है। गेंहू के साथ चना, मसूर, मटर की फसल होने पर इस दवा का प्रयोग न करें। 

ब. सकरी पत्ती वाले खरपतवार 

संकरी पत्ती वाले खरपतवार में जंगली जई, चिरैया बाजरा की समस्या पाई गई है। इससे बीज की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। जिन खेतों में खरपतवार दिखाई दे उन्हें उखाड़ कर नष्ट कर दें। यदि खेत में नींदा बहुत अधिक है तो फसल चक्र अपनायें। ऐसी स्थिति में बरसीम या रिजका की फसल लेना लाभप्रद है क्योंकि चारे की कटाई के साथ ये खरपतवार कट कर नष्ट हो जाते हैं। रासायनिक नियंत्रण हेतु-

  •  मेटाक्सुरान (डोसानेक्स) 400-600 ग्राम सक्रिय तत्व या पेन्डीमिथलीन 400 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ की दर से बोनी के तुरंत बाद तथा अंकुरण के पहले 250 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

  • आइसोप्रोटूरान 300 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ 250 लीटर पानी में घोल बनाकर बोनी के 30-35 दिन बाद छिड़काव करें। इसके प्रयोग से दोनों ही प्रकार के खरपतवार नियंत्रित किये जा सकते हैं।

  • खेत में दोनों प्रकार के नींदा है तो आइसोप्रोटूरान 300 ग्राम सक्रिय तत्व तथा 2-4, डी 200 ग्राम सक्रिय तत्व का मिश्रण प्रति एकड़ की दर से उपरोक्त बताई विधि अनुसार उपयोग करें। इस मिश्रणों के प्रयोग से चिरैया, बाजरा, जंगली जई एवं अन्य खरपतवारों को प्रभावी रुप से नियंत्रित किया जा सकता है।

  • नींदा नाशक दवा का छिड़काव प्रथम सिंचाई के एक सप्ताह बाद करें। छिड़काव के समय मिट्टी में नमी का होना अति आवष्यक है।

पौध संरक्षण-  

अ. रोग

गेंहू की उपज पर रोग के प्रकोप से उपज में काफी प्रभाव होता है। केवल गेरुआ रोग से ही गेंहू की उपज में लगभग 12 प्रतिशत की हानि होती है।


अ. भूरा अवस्था : गेंहू की पत्तियां पर नारंगी भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है जो गोल होते हैं
ब. काला गेरुआ : इसका प्रकोप अधिकतर तने पर आता है।
स. पीला गेरुआ : इस रोग में पत्तियां की उपरी सतह पर पीले रंग धब्बे उभर आते हैं।

इन रोगों की रोकथाम के लिये रोगरोधी किस्में लगायें तथा उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करें, फसल की सामयिक बोनी करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर जिंक मेंगनीज कार्बामेट 800 ग्राम या जिनेव 1 किलो ग्राम पति एकड़ 400 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।
कड़वा रोग - यह बीज जनित रोग है। रोगी पौधों में बलियां कुछ पहले निकल आती हैं। इन बालियों में दानों के स्थान पर कहै, जो हवा केझोंके के साथ एक पौधे से दूसरे पौधों तक पहुंच जाता है। रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिये। रोगरोधी किस्मों काोला चूर्ण भरजाता ही लगाना चाहिये। बोनी के पहले बीज को बीटावेक्स कार्बोक्सिन 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचार करना चाहिये।

  • कर्नलबंट - इस रोग का प्रभाव पर होता है। दानों में काले रंग का पावडर बन जाता है। यह रोग बीज द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम के लियेजिस खेत में रोग लगा हो उस खेत में 2-3 वर्ष तक गेंहू नहीं बोना चाहिये। बोने से पहले बीज को थायरम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज केदर से उपचारित करें। फूलने की अवस्था में सिंचाई न करें।

  • पर्ण ब्लास्ट - पत्तियां किनारों से सूखना प्रारम्भ करती है। आरम्भ में पत्तियो में अंडाकर सूखे धब्बे दिखाई देते हैं, बाद में यह टूटकर पूरी पत्तियाें में फैल जाते है। नियंत्रण हेतु डायथेन (एम-45 0.25 प्रतिशत) के घोल का छिड़काव फसल पर करें।

ब. कीट õ

गेंहू की फसल में दीमक, जडमाहो, भूरी मकड़ी आदि कीटो का प्रकोप होता है। इनके नियंत्रण हेतु एकीकृत कीट प्रबंधन विधि अपनाये।

एकीकृत कीट प्रबंधन

  • खेत की अच्छी तरह जुलाई करना चाहिये।  

  • कच्ची व अधपकी गोबर की खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि इसके प्रयोग से दीमक के प्रकोप की सम्भावना अधिक होती है।

  • खेत के आसपास मेढ़ो में यदि दीमक का बमीठा हो तो उसे गहरा खोदकर नष्ट कर देना चाहिये। 

  •  गेंहू की बुवाई समय पर तथा बीज उपचारित करें। यदि दीमक के प्रकोप की सम्भावना है तब बीज को क्लोरोपायरीफास 20 ई.सी. 400 मि.ली. 5 लीटर पानी में घोलकर 100 किलोग्राम बीज का उपचारित करें। देरी से बोये गये (दिसम्बर-जनवरी) गेंहू पर जड़ माहो का प्रकोप अधिक होता है। अत: समय पर बोनी करें।

  • खड़ी फसल पर दीमक या जडमाहो का प्रकोप होने पर क्लोरोपायरीफास 20 ई.सी. 500 मि.ली. प्रति एकड़ की दर से दवा को सिंचाई जल के साथ दें। अर्धसिंचित भूमि में उपरोक्त दवा की मात्रा 3 लीटर पानी में घोलकर 50 किलोग्राम रेत में मिलाकर खेत में फैलाकर पानी लगावें।

  • अर्धसिंचित फसल में नवम्बर-दिसम्बर माह में कल्ला छेदक भृंग नियंत्रण के लिये मेलाथियान 200 मि.ली. या मिथाइल डेमेटान 250 मि.ली. दवा का 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। इससे जेसिड का भी नियंत्रण हो जाता है। 

  • भूरी मकड़ी का प्रकोप असिंचित गेंहू पर होता है। नियंत्रण के लिये फारमोथियान 25 ई.सी. का 260 मि.ली. प्रति एकड़ या मिथाइल डेमेटान का 260 मि.ली. प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें। यदि आवश्यक हो तो 15 दिन बाद दवा का पुन: छिड़काव करें।

कटाई एवं गहाई

  • पकी फसल की कटाई जल्दी करना चाहिये, क्योंकि आग एवं ओला से कभी-कभी पकी फसल को बहुत नुकसान होता है। अधिक पकी फसल काटने से बालियां टूटती है और दाने झड़ते है। फसल की कटाई सुबह और शाम के समय करना चाहिये, इससे दाने कम झड़ेंगे। कटाई तेज धार वाले हंसिया से करना चाहिये। काटी गई फसल को तुरंत बोझों में बाँध लेना चाहिये, क्योंकि कटाई के समय तेज हवा चलने से कटी हुई फसल उड़ कर खराब हो जाती है। काटी गई फसल के बोझों को बैलगाड़ी या ट्रेक्टर ट्राली से ढुलाई करके खलिहान से इकट्ठा करना चाहिये। खलिहान में थ्रेसर या बैलों से गहाई करना चाहिये। इसके बाद उड़वानी द्वारा दाना अलग करके धूप में सुखाकर भंडारित करना चाहिये। खलिहान में आग और चूहों से बचाव करना चाहिये।

    औसत उपज - सिंचित दशा में : 16-20 क्विंटल प्रति एकड़
    बारानी दशा में : 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ं
     


M.P. Krishi
 
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