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रोग
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फाईटोपथोरा ब्लाइट |
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हिन्दी नाम |
फाईटोपथोरा झुलसन |
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कारक जीवाणु |
फाईटोपथोरा पेरासिटीका
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लक्षण एवं क्षति
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पत्तियों तनों पर जलासिक्त धब्बे दिखते है।
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इस स्थान पर सिंघाड़े के धब्बे बनते है जो बाद में काले हो जाते
है।
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आध्द वातावरण में रोग तेजी से फैलता है जिससे पौधा झुलस जाता
है।
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जड़े सड़ जाती है।
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नियंत्रण
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0.3 प्रतिशत एप्रोन 35 एस.डी. या थाईरम 0.3 प्रतिशत या
ट्राईकोडर्मा हजारीएनम या टी.विरिडी. या बेसीलस
सबटिलिस 0.4 प्रतिशत से बीजोपचार कर बोना चाहिए।
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तना एवं जड़ सड़न की स्थिति में सात दिन के अंतराल से
मिट्टी को रोग ग्रसित पौधों के साथ 2 या 3 बार रेडोमिल
एमजेड 0.25 प्रतिशत घोल से गीला करना चाहिए।
या
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रेडोमिल एमजेड 0.25 प्रतिशत या कॉपर ओक्सीक्लोराइड 0.25
प्रतिशत का 10 दिन के अंतराल से रोग के शुरू होने पर
तीन बार छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
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पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
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फसल चक्र अपनाए।
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अन्तरवर्तीय फसलें जैसे तिल और बाजरा ( 3:1 ) को अपनाए।
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रोग
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स्टेम एवं रूट
रॉट |

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हिन्दी नाम |
स्टेम एवं रूट रॉट |
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कारक जीवाण
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स्टेम एवं रूट रॉट |
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लक्षण एवं क्षति
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रोग ग्रसित पौधे की जड़े तथा आधार पर से छिलका हटाने पर काले
स्क्लेरोशियम दिखते है जिनसे जड़ का रंग कोयले के समान धूसर काला
दिखता है।
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संक्रमित जड़ कम शक्ति लगाने पर भी कांच के समान टूट जाती है।
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तने के सहारे जमीन की सतह पर सफेद फंफूद दिखती है जिसमें राई
के समान स्क्लेरोशिया होते है।
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फ्यूजेरियम सेलेनाई फंफूद के संक्रमित पौधों की जड़ सिंकुड़ी सी
लालिमायुक्त होती है।
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नियंत्रण
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ट्राईकोडर्मा हजारीएनम या टी.विरिडी. या बेसीलस सबटिलिस
0.4 प्रतिशत या थाईरम 75 एस.डी. 0.15 प्रतिशत और
बेवीस्टीन 0.05 प्रतिशत का 1:1 या थाईरम 75 एस.डी. 0.3
प्रतिशत से बीजोपचार कर बोना चाहिए।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
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पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
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फसल चक्र अपनाए या हर दो साल में खेत बदल दे।
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अन्तरवर्तीय फसलें जैसे तिल और मोथबीन ( 1:1 ) या ( 2:1) को
अपनाए।
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सिंचाई जरूरत पड़ने पर हर दो सप्ताह में करें।
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रोग
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सरकोस्फोरा पत्ती
धब्बा |

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हिन्दी नाम |
टिक्का रोग
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कारक जीवाण
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सरकोस्फोरा सिसमी
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लक्षण एवं क्षति
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इस रोग में पत्तियों पर छोटे अनियंत्रित भूरे धब्बे बनते है जो
बाद में बड़े हो जाते है।
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रोग की अधिकता में अधिकतर पत्तियां झड़ जाती है।
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नियंत्रण
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थाईरम 75 एस.डी. 0.15 प्रतिशत और बेवीस्टीन 0.05 प्रतिशत
का 1:1 से बीजोपचार कर बोना चाहिए।
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टापसिन एम. 0.1 प्रतिशत के तीन छिड़काव 15 दिन के अंतराल
से रोग के शुरू होने पर करें।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्मों जैसे टी.के.जी.-21 का उपयोग करें।
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मानसून के आने के तुरन्त बाद बोनी करें।
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पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
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अन्तरवर्तीय फसलें जैसे तिल और बाजरा ( 3:1 ) को अपनाए।
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रोग
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कोरिनोस्पोरा ब्लाइट |
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हिन्दी नाम |
कोरिनोस्पोरा अंगमारी
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कारक जीवाण
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कोरिनोस्पोरा केसीकोला |
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लक्षण एवं क्षति
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पत्तियों पर अनिंयत्रित बेंगनी धब्बे बनते है।
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रोगी पत्तियां मुड़ जाती है।
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नियंत्रण
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थाईरम 75 एस.डी. 0.15 प्रतिशत और बेवीस्टीन 0.05 प्रतिशत का
1:1 से बीजोपचार कर बोना चाहिए।
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टापसिन एम. 0.1 प्रतिशत के तीन छिड़काव 15 दिन के अंतराल से
रोग के शुरू होने पर करें।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
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मानसून के आने के तुरन्त बाद बोनी करें।
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स्वच्छ खेती करें।
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पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
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अन्तरवर्तीय फसलें जैसे तिल और बाजरा ( 3:1 ) को अपनाए।
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रोग
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पाऊडरी मिल्डयू |
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हिन्दी नाम |
बुकनी
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कारक जीवाण
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ओइडियम
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लक्षण एवं क्षति
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पत्तियों पर सफंद चूर्ण दिखता है।
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रोग की तीव्रता में तनों पर भी दिखता है।
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पत्तियां झड़ जाती है।
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नियंत्रण
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0.2 प्रतिशत गीला सल्फर का 10 दिन के अंतराल से रोग के शुरू
होने से पत्तियों पर छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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मानसून के आने के तुरन्त बाद बोनी करें।
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स्वच्छ खेती करें।
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पौधे के अवशेषों को जलाकर नष्ट करें।
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अन्तरवर्तीय फसलें जैसे तिल और बाजरा ( 3:1 ) को अपनाए।
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रोग
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बेक्टीरियल
ब्लाइट |
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हिन्दी नाम |
जीवाणु झुलसन
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कारक जीवाण
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जेन्थोमोनस केम्पेस्ट्रिस पीवी. सिसमी |
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लक्षण एवं क्षति
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पत्तियों पर गहरे भूरे से काले अनियमित धब्बे दिखते है, जो
आर्ध्द एवं गर्म वातावरण में तेजी से बढ़ने के कारण पत्ते
गिर जाते है।
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तनों के संक्रमण में पौधा मर जाता है।
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नियंत्रण
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बोने से पहले बीजों को 52 डि.सेन्टीग्रेड पर 10 मिनिट
गर्म पानी से बीजोप्चार करें।
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रोग के लक्षण प्रकट होते ही स्ट्रेपटोसाइलिन ( 500
पी.पी.एम.) का पत्तियों पर छिड़काव करें।
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यदि आवश्यक हो तो 15 दिन के अंतराल से दो बार छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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फसल चक्र अपनाए।
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फसल अवशेषों को नष्ट करें।
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रोग
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बेक्टीरियल लीफ स्पाट
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हिन्दी नाम |
जीवाणु पत्ती धब्बा |

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कारक जीवाण
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सूडोमुनास सिरेंजी
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लक्षण एवं क्षति
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पत्तियों पर गहरे भूरे कोणीय धब्बे जिनके किनारे काले रंग के
दिखते है जो आर्ध्द एवं गर्म वातावरण में तेजी से बढ़तें है
जिससे पत्ते गिर जाते है।
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नियंत्रण
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बोने से पहले बीजों को 52 डि.सेन्टीग्रेड पर 10 मिनिट
गर्म पानी से बीजोप्चार करें।
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रोग के लक्षण प्रकट होते ही स्ट्रेपटोसाइलिन ( 500
पी.पी.एम.) का पत्तियों पर छिड़काव करें।
-
यदि आवश्यक हो तो 15 दिन के अंतराल से दो बार छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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फसल चक्र अपनाए।
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फसल अवशेषों को नष्ट करें।
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रोग
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फाईलोडी
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हिन्दी नाम |
पर्णताभ |

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कारक जीवाण
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माइकोप्लाज्मा
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लक्षण एवं क्षति
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सभी पुष्पी भाग हरे रंग के पत्तियों के समान हो जाते है।
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पत्तियां छोटी गुच्छों में लगती है।
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रोगी पौधों में फल्ली नहीं बनती, यदि बनती है तो बीज रहित होती
है।
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नियंत्रण
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फोरेट 10 कि.ग्रा.#हे की दर से मिट्टी में मिलाए।
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0.03 प्रतिशत डाई मेथोएट का छिड़काव बोनी के 30, 40 एवं 60 दिन
बाद करें।
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आई.पी. एम
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रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ फेंके।
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मानसून आने के 3 सप्ताह बाद बोनी करें।
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अन्तरवर्तीय फसलें जैसे तिल और अरहर 1:1 के अनुपात में उगाए।
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