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रोग |
फयूजेरियम विल्ट |
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हिन्दी नाम
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उकटा रोग
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कारक जीवाणु
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फयूजेरियम ओक्सीस्पोरम
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लक्षण एवं क्षति
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फंफूद बीज और मिट्टी से होती है।
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नये पौधे गिर जाते है।
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भूमि से सटे तने के भाग के नीचे
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आन्तरिक तन्तुओं का रंगहीन और काला पड़ जाता है।
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पत्तियां मुड़ जाती है और फिर गिर जाती है। नये पौधे में पत्ते और तने के सिरे लटकते और मुरझा हुए
दिखाई पड़ते है।
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नियंत्रण
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बीज को 2.5 ग्राम/ हे. कार्बाडाजीन स्रे उपचारित करें।
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एक किलो बीज को 1.5 ग्राम बेनोमाइल या 1 ग्राम थाईरम और 2
ग्रामार्बाडजिम से उपचारित करें।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक जातियां जैसे जे.जी.-315 नं 10
सी.-214,जी.-24,एस.-26, बी.जी.-244, पूसा-212 और अवरोधी का
उपयोग करें।
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उन खेतों में जहाँ यह रोग पाया गया हो तीन साल तक चने की खेती
न करने का फसल चक्र अपनाए।
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रोग मुक्त बीजों का उपयोग करें।
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अधिक तापमान पर बोनी न करें।
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रोग
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कॉलर रॉट
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हिन्दी नाम
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स्तंभ मूल विगलन |
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कारक जीवाणु
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स्कलेरोशियम रॉल्फसाई |
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लक्षण एवं क्षति
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यह रोग
मध्यप्रदेश के उत्तरी भाग में ज्यादा प्रकोप होता है।
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8 पौधे की
प्रांरभिक अवस्था में ( बोनी के 6 सप्ताह के बाद ) में इस रोग
का प्रकोप होता है।
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मिट्टी में
अत्याधिक नमी,मिट्टी का कम पी एच और ज्यादा तापमान इस रोग के
लिए अनुकूल ह पौधों का पीला पड़ना।
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स्तंभ मूल संधि
में सुकुड़न और सड़न हो जाती है।ठ्ठ
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प्रभावित भाग
पर सफेद फंफूद दिखाई पड़ती है।
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फंफूद की गोल
छोटी बनावट स्कलेरोसिया तारों के बीच दिखाई पड़ती है।
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नियंत्रण
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बुआई के पहले खेत में पिछली फसल के अवशेष नष्ट कर दें।
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एक किलो बीज को 1.5 ग्राम बेवस्टीन या 1.5 ग्राम थाईरम से
उपचारित करें।
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आई.पी. एम
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बुआई के समय अधिक नमी नहीं होना चाहिए।
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बुआई के पहले खेत में पिछली फसल के अवशेष नष्ट कर दें।
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खेत से विना सड़ा हुए पदार्थ को अलग कर दे।
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रोग
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डाई रूट रॉट
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हिन्दी नाम
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युष्क-मूल विगलन
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कारक जीवाणु
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राईजोक्टोनिया बटाटीकोला या माइक्रोफोमिना फेसीलिना
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लक्षण एवं क्षति
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30 डि. से. से ज्यादा तापमान में होती है।
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फूल या फल्ली बनने पर होती है।
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प्रभावित पौधे मुड़ जाते है और भूसी के रंग के हो जाते है जो
पुरे खेत में पाये जाते है।
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जड़े सूख जाती है और टुटने लगती ।
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नियंत्रण
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एक किलो बीज को 1.5 ग्राम बेवस्टीन या 1.5 ग्राम थाईरम
से उपचारित करें। या एक किलो बीज को 3 ग्राम केपटन या पी.सी.एन.बी. से उपचारित
करें।
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प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
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सूखे से बचाव करें।
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बोनी समय पर करें।
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अंकुरित बीजों को अधिक तापमान से बचाए।
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रोग
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काला रूट रॉट |
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हिन्दी नाम
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काला जड़
विगलन |
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कारक जीवाणु
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फयूजेरियम सोलानी
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लक्षण एवं क्षति
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हल्की भूमि में नमी की अधिकता होने पर फ्यूजेरियम सोलेनाई नामक
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कवक से उस रोग का प्रकोप होता है।
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अत्याधिक नमी में होती है।
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जड़ से जुड़े तने पर काले धब्बे दिखाई पड़ते है।
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जड़ों का काला पड़ना और सड़ जाना।
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नियंत्रण
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एक किलो बीच को 1.5 ग्राम बेवीस्टन से उपचारित करें।
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जैविक खाद के प्रयोग से रोग की तीव्रता कम ही जा सकती है।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
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गर्मी में गहरी जुताई करें।
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अच्छे जल निकास की व्यवस्था करें।
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रोग
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एस्कोकाइटा ब्लाइट |
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हिन्दी नाम
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चांदनी
रोग
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कारक जीवाणु
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एस्कोकाइटा रैबी
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लक्षण एवं क्षति
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यह रोग बीज से होता है।
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पौधे के निचले भाग पर भूरे धब्बे बनना और पौधे का मुरझा कर
सूख जाना।
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बाद में पत्तियों में काले धब्बे हो जाते है।
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नियंत्रण
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एक किलो बीज को 3 ग्राम ऐरोसोन से उपचारित करें।
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संक्रमण कम करने के लिए गर्म पानी से बीज को उपचारित करें।
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0.2 प्रतिशत डाइथेन का फसल पर छिड़काव करें।
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2.3 ग्राम बोडीएक्स प्रति लीटर से फसल पर छिड़काव करें।
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2.3 ग्राम गीली गंधक प्रति लीटर से फसल पर छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्में जैसे गौरव,एफ.8, सी.-235,जी.-543, एच.-75-35,
जी.जी.668, जी.एन.जी.-146.बी.जी. 261 और सी.जी. 558 का
उपयोग करें।
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रोग मुक्त बीजों का उपयोग करें।
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खेत की साफ सफाई का ध्यान रखें।
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पौधे के अवशेषों को नष्ट कर दें।
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फसल चक्र अपनाए।
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गेहूँ और सरसों के साथ उगाए।
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प्रभावित पौधों को उखाड़ कर जल दें।
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कटाई के बाद 10 दिन तक फसल सुखाए।
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बीज को डेढ़ से.मी. की गहराई पर बोये।
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फसल को अत्याधिक वनस्पति वृध्दि से बचायें।
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रोग
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आल्टानेरिया ब्लाइट
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हिन्दी नाम
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आल्टानेरिया अंगमारी
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कारक जीवाणु
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आल्टानेरिया आल्टरनेटा
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लक्षण एवं क्षति
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यह रोग बीज और मिट्टी से होता है।
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अत्याधिक नमी और 20 से 25 डि.से. तापमान इस रोग के लिए अनुकूल
है।
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फूल आने की अवस्था में यह रोग होती है।
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प्रभावित फूल मर जाते है।
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पत्तियों पर अधिक प्रकोप होता है।
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निचले पत्ते झड़ जाते है।
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पत्तियों पर छोटे गोल बेंगनी धब्बे दिखाई पड़ते है।
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फलियां काली पड़ जाती है।
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फली में दाने सुकड़ जाते है।
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नियंत्रण
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मेनकोज़ेब 3 ग्राम
/लीटर की दर से छिड़काव करें। या कार्बाडजिम 1.5 ग्राम
/लीटर का छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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पौधे दूर दूर लगाए।
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अत्याधिक वनस्पति वृठ्ठि पर निंयत्रण करें।
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रोग
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स्टेमफाइलम ब्लाइट
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हिन्दी नाम
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स्टेमफाइलम ब्लाइट रोग
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कारक जीवाणु
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स्टेमफाइलम सरसिनीफॉर्मि |
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लक्षण एवं क्षति
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फंफूद के कारण यह रोग होता है।
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फसल की अत्याधिक वनस्पति वृठ्ठि, अधिक आर्ध्दता से यह रोग होता
है।
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पत्तियों और फलियों पर खुरदरे अण्डाकार धब्बे जिनका केन्द्र
काला भूरा और बाहरी चौड़ा एवं भूरा होता है। इनकी किनार स्लेटी
होती है।
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फसल में फूल आने पर प्रकोप दिखता है और निचली पत्तियां झड़ जाती
है।
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नियंत्रण
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3 ग्राम
/लीटर मेनकोजेब का छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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फसल की अत्याधिक वृठ्ठि रोके।
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पौधों के बीच अधिक दूरी रखें।
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रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ दे जिससे फसल को अधिक धूप व प्रकाश
मिलें।
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अलसी को अन्तरवर्तीय फसल के रूप में उगाए।
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रोग
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बॉट्राइटिस धूँसर फंफूद रोग
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हिन्दी नाम
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ग्रे
मोल्ड |
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कारक जीवाणु
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बॉट्राइटिस सिनेरिया |
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लक्षण एवं क्षति
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फूल झड़ने लगते है और फलियां नहीं बनती है।
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वातावरण में अधिक आर्द्रता से पौधे पार भूरे या काले भूरे धब्बे
हो जाते है और खेत में कई जगह पौधे मर जाते है।
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पौधे के पत्तियों से ढके हुए भागों में बीमारी की संभावना
ज्यादा होती है।
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धब्बे 10 से 30 मि.मी. तक लम्बे होकर तने को ढाक लेते है।
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तन्तुओं के सड़ने से टहनियां टुट जाती है।
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फली में दाने नहीं बनते और अगर बनते है तो सिकुड़े होते है।
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दाने पर भी फंफूद के तार दिखाई पड़ते है।
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नियंत्रण
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5-6 किलो कैप्टन प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
पन्द्रह दिन बाद फिर छिड़काव करें।
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एक किलो बीज में तीन ग्राम थाईरम और कार्बनडाजिम 1:1 के
अनुपात में उपचारित करें।
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एक लीटर पानी में 3 मि.ली. कार्बनडाजिम का छिड़काव करें। 3 ग्राम / लीटर मेनकोज़ेब का छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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अत्याधिक वनस्पति वृठ्ठि रोकें।
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विना फैलाव वाली जातियों का उपयोग करें।
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देर से बोनी करें।
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अत्याधिक सिंचाई न करें।
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अलसी को अन्तरवर्तीय फसल के रूप में उगाए।
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खेत में अत्याधिक नमी को रोके।
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बुआई पास पास प करें।
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रोग
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रस्ट |
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हिन्दी नाम
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किटट्
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कारक जीवाणु
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यूरोमासीस
साइसर एरीटीमी |
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लक्षण एवं क्षति
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फरवरी के अन्त में यह रोग होता है।
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पत्तियां घनी होने लगती है जिससे छोटे गोल या अण्डाकार भूरे
धब्बे दिखाईपड़ते है।
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छोटे धब्बे मिलकर बड़े धब्बे बनाते है।
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प्रभावित पत्तियां सूखकर गिर जाती है।
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नियंत्रण
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एक हेक्टेयर में
2-4 किलो गंधक का छिड़काव करें। या
रोग के लक्षण दिखते ही 3 ग्राम मेनकोजेब प्रति लीटर का
छिड़काव करें। अगर आवश्यकता हो तो दस दिन के अन्तराल पर
पुन:छिड़काव करें।
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आई.पी. एम
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प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
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